किसान आंदोलन

Farmer Movement in Hindi


Hello दोस्तों ज्ञान उदय में आपका एक बार फिर स्वागत है और आज हम जानते हैं, राजनीति विज्ञान में ‘किसान आंदोलन’ के बारे में । सामाजिक और लोकतांत्रिक आंदोलन में किसान आंदोलन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है ।


भारत में हर तरह के लोग रहते हैं । अमीर, गरीब आदि । भारत में लोगों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है । बल्कि जनसाधारण के लिए इसका अर्थ बहुत बड़ा है । उनकी निर्धनता, बेकारी, भुखमरी, आर्थिक सामाजिक शोषण, इत्यादि का अंत बहुत ज़रूरी है । यह समानता तथा न्याय पर आधारित एक नए समाज की आशा है । लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संविधान निर्माताओं ने पश्चिमी उदारवादी परंपराओं पर आधारित व्यवस्था स्थापित की ।


इसके अंतर्गत शासन वर्ग तथा राजनीतिक विशिष्ट वर्ग के सामने यह एक चुनौती थी । लोकतंत्र में जनसाधारण के जीवन में परिवर्तन लाना, यह एक चुनौती थी । प्रशासन को सामाजिक आर्थिक विकास तथा परिवर्तन का साधन बनाए और राजनीति में लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करें । परंतु आर्थिक सामाजिक विकास तथा परिवर्तन के लिए ज़रूरी आधार नहीं बनाए गए । जनजातियों, दलितों, किसानों तथा शहरी गरीबी सहित, ग्रामीण भूमिहीन गरीबों व समाज के दलित वर्गों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कुछ खास नहीं किया ।


इसकी वजह से असंतुलन अत्यधिक बढ़ता जा रहा है । राजनीतिक दलों तथा जागरूक नागरिकों के द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों, समुदायों तथा जनसाधारण में जागरूकता लाने और उन्हें राजनीति में शामिल करने की प्रक्रिया भी जारी है । इस लोकतांत्रिक राजनीतिकरण के दो परिणाम हो रहे हैं ।


1 लोगों द्वारा चुनावों में असंतोष को व्यक्त करना और


2 चुनाव के माध्यम से भी असंतुष्ट होकर गैर-संसदीय माध्यम से असंतोष एवं विद्रोह का प्रदर्शन करना ।

इस असंतोष ने एक विशेष समर्थन और एक सक्रिय भागीदारी प्राप्त की है । जिसके कारण समाज में उस तरह के आंदोलनकारी संगठन तथा जन आंदोलन विकसित हुए हैं ।


किसान आंदोलन


भारत एक कृषि प्रधान देश है । भारत की आबादी का 70% हिस्सा गांव में निवास करता है । स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारी ग्रामीण कृषि व्यवस्था दो गंभीर समस्याओं का शिकार थी ।


1 यह अल्पविकसित थी । सिंचाई तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं ना के बराबर उपलब्ध थी । परिणाम स्वरूप अनाज का स्तर अत्यंत कम था ।

2 कृषि भूमि का बंटवारा अत्यधिक असमान था । कुछ अमीर किसान और जमीदार भूमि के बड़े भाग के मालिक थे । ग्रामीण जनसंख्या का बड़ा भाग भूमिहीन श्रमिकों का था । कृषि करने वाले लोग निर्धन और गरीब थे और जमीदारों के द्वारा उनका शोषण हो रहा था ।


भारत की सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियां थी । जिसमें से एक यह थी कि कृषि उत्पादों में तीव्र गति से वृद्धि करना और समाजवादी व्यवस्था में परिवर्तन करना तथा न्याय पूर्ण समाज बनाना ।


इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कई नीतियां बनाई गई । इसमें से एक पंचवर्षीय योजना है । जिस को लागू करने से कृषि में सुधार आए । जमींदारों की प्रथा को खत्म करना । परंतु इन नीतियों का परिणाम सफल रहा । जिसके कारण आज भारत में व्यापक आंदोलन विकसित हो रहे हैं ।

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बड़े किसानों के कृषि आंदोलन


जमीदारों के उन्मूलन तथा बाद में कृषि सुधार कानून बनाने के बावजूद, कृषि क्षेत्र में सामंतवादी व्यवस्था बनी रही । जमीदार तथा बड़े किसान यथास्थिति बनाए रखने से प्रसन्न थे । उन्होंने अपनी आर्थिक जातीय तथा सामाजिक स्थिति के आधार पर राजनीति दबावों के कारण सरकार को कुछ ना कुछ सुधार करने पड़े । इन सुधारों का परिणाम यह था कि ग्रामीणों और बड़े किसानों के साथ एक नया वर्ग विकसित हुआ । जो मध्यमवर्ग कहलाया । 1960 के दशक में अंतिम वर्षों में आरंभ हरित क्रांति से देश के मध्यम वर्ग और किसानों को नए लाभ प्राप्त हुए । 1970 के दशक में अधिक राज्यों और केंद्र में किसानों को अपनी सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति की स्पष्टता और अपने हितों की रक्षा और चेतना से राजनीति को प्रभावित किया । इससे ही किसान वर्ग ने अपने को संगठित करना आरंभ किया । इसका आरंभ राज्य स्तरीय संगठनों तथा आंदोलनों में हुआ । बाद में राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने के प्रयत्न किए गए । उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा में भारतीय किसान यूनियन संगठन की स्थापना हुई । महाराष्ट्र में हितकारी संगठन इत्यादि बनाए गए ।


अत्यंत उग्र तथा महत्वपूर्ण रूप में विकसित हुए इन किसान आंदोलन के मुख्य लक्ष्य थे ।


1 कृषि उत्पादों के लिए अधिक मूल्य प्राप्त करना ।


2 कृषि के लिए अधिक बिजली पानी खाद कम दरों पर उपलब्ध हो ।


3 भूमि सुधारों का विरोध ।


4 कृषि पर काम करने वाले मजदूरों को न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए ।


5 नियोजन प्रक्रिया में ग्रामीण क्षेत्रों का अधिक विकास हो ।


6 ग्रामीण लोगों को सभी तरह की सुविधाएं प्राप्त हो ।


इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बड़े तथा मध्यम वर्ग के किसानों ने गैर राजनीतिक संगठन बनाकर आंदोलन किए । जुलूस और बैठक की । दबाव समूह के रूप में भूमिका निभाई । दबाव डालने के साथ-साथ राजनीतिक दलों को अपने समर्थन के आधार पर लेनदेन की राजनीतिक भी अपनाई । इस प्रकार यह किसान राजनीतिक दलों को प्रभावित करने में सफल होने लगे । विशेष रूप से उन राज्यों में जहां किसी से अधिक विकसित हैं । जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र आदि ।
राजनीति में किसानों की भूमि निर्णायक हो गई थी । परिणाम स्वरूप किसान आंदोलन आज भी भारतीय राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ।

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खेतिहर मजदूरों के आंदोलन

जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है । वहीं पर कृषि अत्यंत परंपरागत तरीकों से होती रही है । भूमि का बंटवारा असमान है । जिन राज्यों में हरित क्रांति में सफलता से भूमि का विकास हुआ है । वहां भी भूमि का बंटवारा अत्यंत असमान है । अल्प विकसित तथा पिछड़े राज्यों में भूमिहीन किसानों को पूरा काम ही नहीं मिलता । साल में कई दिन बेरोजगार रहते हैं । बेरोजगारी के कारण वह अपने मालिकों पर पूरी तरह आश्रित रहते हैं । अतः इन राज्यों में सामंतवादी, बंधुआ मजदूरी और बेरोजगारी की समस्याएं गंभीर है । विकसित राज्यों में श्रमिकों को काम तो मिलता है । परंतु इन राज्यों में भूमि का श्रमिकों को उचित वेतन नहीं मिलता और भूमि के बंटवारे की समस्याएं हैं ।


निष्कर्ष के रूप में अगर कहा जाए तो, भूमिहीन किसानों के आंदोलन और ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक जागृति । समानता के लिए संघर्ष । सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठा रहे हैं और इनके द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को दबाया नहीं जा सकता ।

तो दोस्तों ये था किसान आंदोलन । अगर Post अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों के साथ share करें । जब तक के लिए धन्यवाद !!

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