प्लेटो अरस्तु के विचारों की तुलना

प्लेटो और अरस्तु के विचारों में तुलनात्मक विश्लेषण

Hello दोस्तो ज्ञान उदय में आपका स्वागत है, आज जानते है प्लेटो और अरस्तु के विचारों और इनमें अंतर के बारे में । जैसा कि आप सभी जानते हैं, सुकरात, प्लेटो और अरस्तु महान विचारक रहे हैं और इनमें आपस मे गुरु और शिष्य का संबंद्ध है । सुकरात, प्लेटो के गुरु थे और प्लेटो के शिष्य अरस्तु थे |

प्लेटो , यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक, गणितज्ञ थे और पश्चिमी जगत की दार्शनिक पृष्ठभूमि को तैयार करने में इन तीनों दार्शनिको ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | Plato अफलातून के नाम से भी जाने जाते है | पश्चिमी जगत में उच्च शिक्षा(Higher Education) के लिए पहली संस्था “Academy” की स्थापना का Credit भी प्लेटो को ही जाता है | उन्हें दर्शन और गणित के साथ साथ तर्कशास्त्र एवं नीतिशास्त्र का भी अच्छा ज्ञान था | प्लेटो ने काव्य की सामाजिक उपादेयता का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

अरस्तू एक ग्रीक दार्शनिक थे । अरस्तु प्लेटो का सबसे प्रिय शिष्य थे । वें दुनिया के बड़े विचारकों में से एक थे । अरस्तु के विचारों पर अपने गुरु प्लेटो के विचारों का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा । अरस्तु ने अपने लेख में अनेक क्षेत्रों को शामिल किया है । अरस्तू का मानना था कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है और ये मिटटी, जल, वायु, और अग्नि से मिलकर बनी है । उनके पिता की मौत उनके बचपन में ही हो गये थी । 17 वर्षीय अरस्तु को उनके अभिभावक ने शिक्षा पुरी करने के लिए बौद्धिक शिक्षा केंद्र एथेंस भेज दिया। अरस्तु 20 सालों तक प्लेटो के शिष्य रहे और प्लेटो अपने शिष्य को अकादमी का मस्तिष्क कहा करता थे । इसी कारण ई. एम. फॉरस्टर अरस्तु सभी प्लेटो वादियों में महान हैं ।

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दोनों विद्वानों के विचारों में अनेक तथ्यों पर समानता पाई जाती है । इसके अलावा कई मतों में गंभीर अंतर व भिन्नता पाई जाती है । प्रमुख समानताएं व असमानताएं इस प्रकार हैं ।

प्लेटो और अरस्तु के विचारों में समानताएं

शिक्षा को दोनों ही विचारक सर्वाधिक महत्व देते हैं । राज्य नियंत्रित शिक्षा, व्यवस्था, स्वास्थ्य, सुंदर तथा जीवन की कर्तव्य पूर्ति को शिक्षा का महत्वपूर्ण साधन मानते हैं ।

दोनों ही विचारक शासन में कानून की महत्वता का प्रतिपादन करते हैं । अरस्तु राजनीति में कानून को उच्च स्थान देता है, तो अरस्तु प्लेटो लाज में व्यवहारिकता में कानून के शासन को प्रतिष्ठित करता है ।

दोनों ही विचारक नागरिकता को सीमित करने के पक्ष में है तथा दोनों का मानना है कि शासन कार्य में सभी  संपूर्ण नहीं होते ।

दोनों विचारक यूनान के राजनीतिक जीवन की स्थिरता व अव्यवस्था को आशंका की दृष्टि से देखते थे और इसके लिए दोनों की मान्यता थी कि छोटे नगर राज्यों में ही सर्वोत्तम जीवन प्राप्त किया जा सकता है । दोनों ही नगर राज्यों को स्वाबलंबी और स्थिर बनाने के पक्ष में थे ।

दोनों ने ही शासन में ‘न्याय’ को महत्वपूर्ण माना है, क्योंकि न्यायपूर्ण शासन व्यक्तियों के हित तथा कल्याण में सहायक है ।

दोनों ही विचारक राज्य को एक नैतिक आध्यात्मिक संस्था मानते हैं । दोनों ही राज्य को व्यक्ति के सर्वागीण विकास के लिए आवश्यक संस्था मानते हैं । दोनों के विचार नैतिकता से भी प्रभावित हैं ।

कुछ अंतरों के बावजूद दोनों विचारक एक मिश्रित संविधान में विश्वास करते हैं ।

दोनों ही प्रजातंत्र को निकृष्ट शासन मानकर उनका विरोध करते हैं तथा पूर्ण समानता में विश्वास नहीं करते ।

प्लेटो और अरस्तु के विचारों में असमानताएं (पद्धति, विचार, दृष्टिकोण के आधार पर)

प्लेटो और अरस्तू दो भिन्न-भिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं । प्लेटो जहां आदर्शवादी, कल्पनावादी तथा हवाई योजनाएं बनाने वाले व्यक्ति हैं । वही अरस्तु यथार्थवादी, व्यवहारवादी तथा वास्तविकताओं से युक्त है । अरस्तु कल्पना पर नहीं बल्कि वास्तविकता पर अपने राजशास्त्र का नियम निर्माण करते है ।

प्लेटो- दार्शनिक राजा का शासन सर्वश्रेष्ठ है । जबकि अरस्तु- यह आवश्यकता व परिस्थितियों पर निर्भर करता है ।

मैक्सी -प्लेटो एक सुपरमैन की खोज करता है, जो आदर्श राज्य की सृष्टि करें, जबकि अरस्तु एक सुपर साइंस की खोज में है जो राज्य को अच्छा बना सके ।

प्लेटो दार्शनिक राजा को निरंकुश बना देता है, जबकि अरस्तु सर्वत्र कानून की श्रेष्ठता या शासन का समर्थक है ।

प्लेटो की पद्धति निगमनात्मक (Deductive) तथा अरस्तु की आगमनात्मक या उद्गमनात्मक (Inductive) है । प्लेटो जहां सामान्य से विशेष नियमों की कल्पना करता है । वहीं पर अरस्तु विशेष घटनाओं और परिस्थितियों के आधार पर सामान्य नियम बनाता है । इस कारण उसके विचार अधिक स्पष्ट, व्यवहारिक व क्रमबद्ध हैं ।

प्लेटो राज्य की एकता में तर्क के कारण व्यक्तियों को राज्य में विलीन कर देता है, लेकिन अरस्तु राज्य को समुदायों का समुदाय मानता है ।

प्लेटो राज्य के संरक्षकों (शासक तथा सैनिक वर्ग) के लिए संपत्ति व परिवार के साम्यवाद की व्यवस्था करता है, तथा मानता है कि शासकों व सैनिकों के पास कोई निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए । जबकि अरस्तु संपत्ति को व्यक्तित्व के विकास के लिए तथा परिवार को भावनात्मक विकास के लिए आवश्यक मानता है ।

प्लेटो जहां राज्य की उन्नति मनुष्य की आवश्यकताओं के कारण मानता है । वही अरस्तु राज्य को परिवार की तरह एक प्राकृतिक संस्था मानता है ।

प्लेटो राज्य को व्यक्ति का वृहद रूप मानता है, जबकि अरस्तु इसे परिवार का वृहद रूप मानता है ।

प्लेटो के विचार परिवर्तन की दृष्टि से अत्यंत क्रांतिकारी हैं, जबकि अरस्तु के विचार रूढ़ीवादी परंपरा को मान्यता देते हैं ।

प्लेटो के विचार अतिवाद से प्रेरित हैं, जिस कारण वह अतिवादी (Extremist) है, वही अरस्तु मध्यम मार्ग (Golden Mean) का अनुसरण करता है ।

प्लेटो तथा अरस्तु की शैली में भी अंतर है -कल्पनाशील होने के कारण प्लेटो की शैली काव्यात्मक तथा सरल है, जबकि पर्यवेक्षक आधारित होने के कारण अरस्तु की शैली विश्लेषणात्मक, शुष्क तथा नीरस है ।

प्लेटो राजनीति को नीतिशास्त्र का अंग मानता है, जबकि अरस्तु राजनीतिक विचारों को नीतिशास्त्र से अलग मानता है । परंतु इस प्रकार राजनीति शास्त्र को नीति शास्त्र से अलग कर एक स्वतंत्र विज्ञान बनाता है ।

निष्कर्ष

हालाँकि प्लेटो तथा अरस्तु का राजनीतिक चिंतन के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान है । दोनों के विचारों में पाया जाने वाला अंतर उनकी मौलिक प्रवृत्तियों में अंतर के कारण हैं । कुछ जगह दोनों विचारक एकमत हैं, फिर भी व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार हर व्यक्ति के विचार अलग अलग होते हैं । प्लेटो अपने विचारों के कारण आदर्शवादी, कल्पनावादि तथा क्रांतिकारियों के प्रति पूर्ण रूप से अनुसरण करते है, जबकि अरस्तु यथार्थवादी, व्यवहारिकवादियों तथा उपयोगितावादियों के जनक के रूप में जाने जाते है । दोनों के विचारों का दुनिया और समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा है और इन्होंने विश्व में अनेक विचारों से अपना योगदान दिया है ।

तो दोस्तों ये थे, प्लेटो और अरस्तु के विचारों का विश्लेषण । अगर आपको ये Post अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों के साथ Share करें । तब तक के लिए धन्यवाद !!

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