Hello दोस्तों ज्ञान उदय में आपका स्वागत है | आज हम बात करते हैं, राजनीति विज्ञान मे राज्य और इसके तत्वों के बारे में | इसमें हम राज्य शब्द की व्युत्पत्ति राज्य की विभिन्न विचारकों द्वारा दी गई परिभाषाएं राज्य शब्द का आधुनिक अर्थों में सबसे पहले प्रयोग तथा राज्य के आधारभूत तत्वों के बारे में जानेंगे |
राज्य क्या है ?
राज्य जिसको हम इंग्लिश में स्टेट कहते हैं, यह राजनीति विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है | कई विचारक राजनीति विज्ञान को राज्य के आधार पर ही परिभाषित करते हैं | जैसे गार्डनर का कहना है कि
“राजनीति विज्ञान का प्रारंभ और अंत राज्य के साथ होता है |”
तो राज्य जो स्टेट है, यह राजनीति विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है और राज्य की संकल्पना राजनीति विज्ञान के अध्ययन का केंद्रीय विषय है | एक विचारक है, आर. जी. गेटेल ने अपनी पुस्तक पॉलीटिकल साइंस में राजनीति विज्ञान की परिभाषा राज्य के विज्ञान के रूप में दी है |
“राजनीति विज्ञान राज्य का विज्ञान है | “
यह परिभाषा आर. जी. गेटेल ने अपनी पुस्तक पॉलीटिकल साइंस में दी है और कई विचारक राजनीति विज्ञान को राज्य का ही अध्ययन मानते तो इस दृष्टि से आप समझ सकते हैं कि राज्य शब्द राजनीति विज्ञान में बहुत ही महत्त्व का है और यूं कहा जाए कि यह केंद्रीय महत्व का शब्द है | एक परिभाषा बार-बार परीक्षाओं में पूछे जाती है कि राज्य परिवार और ग्रामों का ऐसा संगठन है, जिसका उद्देश्य पूर्ण एवं आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है | यह किसके द्वारा दी गई परिभाषा है तो देखिए दोस्तों यह यूनानी विचारक अरस्तु द्वारा दी गई परिभाषा है कि
“राज्य परिवार और ग्रामों का ऐसा संगठन है जिसका उद्देश्य पूर्ण एवं आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है”
अरस्तु राज्य का अस्तित्व इसलिए मानते हैं कि राज्य एक प्राकृतिक और स्वभाविक संस्था है
| इसके उद्देश्य और कार्य रहते हैं और राज्य को सभी संस्थाओं में वह श्रेष्ठ भी मानते हैं और आप जानते हैं कि अरस्तु महान राजनीतिक विचारक हैं जिनको राजनीति विज्ञान का जनक अच्छा जाता है | पॉलिटिक्स और द कॉन्स्टिट्यूशन यह दो पुस्तकें अरस्तु द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण राजनीति ग्रंथ में शामिल हैं | राज्य परिवार और ग्रामों का ऐसा संगठन है जिसका उद्देश्य पूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है यह अरस्तु द्वारा कहा गया है और अरस्तू कहते हैं कि व्यक्ति अपना सर्वांगीण विकास राज्य के अंदर ही कर सकता है क्योंकि राज्य व्यक्तित्व विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण है |
“राज्य बहुसंख्यक समुदाय है जो सामान्य अधिकारों और पारस्परिक लाभों को प्राप्त करने के लिए बनाया जाता है |”
तो यह किसके द्वारा दी गई परिभाषा है तो यह प्राचीन विचारक हैं | यह प्रसिद्ध रोमन विचारक और दार्शनिक सिसरो (Cicero) की परिभाषा है। परिभाषा है जैन बूंदा एक विचारक हैं वह कहते हैं कि राज्य परिवारों और उसकी सामान्य संपत्तियों का एक संघ है जो सर्वोच्च शक्ति और विवेक द्वारा शासित होता है तो बहुत ही महत्वपूर्ण है वह आपको दोस्तों आधुनिक अर्थों में संप्रभुता का जनक भी कहा जाता है |
संप्रभुता शब्द का सबसे पहले प्रयोग बुद्ध ने ही किया था और राज्य परिवारों और उनकी सामान्य संपत्तियों का एक संघ है जो सर्वोच्च शक्ति और विवेक द्वारा शासित होता है यह जो द्वारा दी गई परिभाषा है एक महत्वपूर्ण परिभाषा देखिए ब्लंट असली की है जो कहते हैं कि राज्य किसी निश्चित विभाग में रहने वाले लोगों का वह संग्रह है जो राजनीतिक दृष्टि से संगठित होता है तो यहां पर देखिए राज्य के दो तत्वों की बात भी की गई है विभाग और रहने वाले लोग कि जनसंख्या तो देखिए दोस्तों राज्य किसी ने विभाग में रहने वाले लोगों का वह संघ है जो राजनीतिक दृष्टि से संगठित होता है |
“राज्य एक संगठित इकाई के रूप में मानव जाति का एक विशिष्ट भाग है |”
राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन डब्ल्यू. बर्गेस (John W. Burgess) की है, यह प्रश्न देखिए बार-बार परीक्षाओं में पूछा गया है याद रखिएगा कि राज्य एक निश्चित विभाग में जनता द्वारा कानून यानी विद की स्थापना के लिए संगठित समूह है | राज्य एक निश्चित विभाग में जनता द्वारा विधि की स्थापना के लिए संगठित समूह है तो यह परिभाषा वुडरो विल्सन यानि विल्सन द्वारा दी गई है और यह कई बार परीक्षाओं में पूछा गया है | एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, कथन है कि
“राज्य एक ऐसा क्षेत्रीय समाज है जो शासन (शासक) और प्रजा (शासित) में विभाजित है और जो अपने निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र के अंतर्गत अन्य सभी संस्थाओं में सर्वोच्च है।”
यह किसके द्वारा या किस विचारक की परिभाषा है, यह परिभाषा प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनीतिक विचारक और शिक्षाविद प्रो. हेरोल्ड जे. लास्की (Harold J. Laski) की है। इन्होंने राज्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि राज्य एक ऐसा भी छेत्रीय समाज है जो शासन और प्रजा में विभाजित है और जो अपने निर्धारित भूभाग के अंतर्गत सभी संस्थाओं में सर्वोच्च है | तो हमने पहले ही देखा है कि राज्य सर्वोच्च संस्था है और जो सभी संस्थाओं में सर्वोच्च है सबसे आगे है और सर्वश्रेष्ठ है | राज्य व्यक्तियों का समूह है जो कम या अधिक संख्या में एक निश्चित भूभाग में रहता है जो बाह्य शक्ति के नियंत्रण से सर्वथा लगभग स्वतंत्र हो जिसमें एक सुव्यवस्थित शासन सत्ता या सरकार विमान हो और जिस के आदेश का पालन करने के लिए उस विभाग के प्राय सभी निवासी व्याप्त हैं | यह राज्य की परिभाषा गार्डिनर द्वारा दी गई है तो गवर्नर द्वारा दी गई परिभाषा यह राज्य की एक तरह से पूर्ण और संपूर्ण परिभाषा मानी जाती है कि राज्य व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो न्यून या अधिक संख्या में एक निश्चित भूभाग में रहता है जो बाह शक्ति के नियंत्रण से सर्वथा लगभग स्वतंत्र होता है और जिसमें एक सुव्यवस्थित शासन सत्ता या सरकार विद्यमान हो और जिस के आदेश का पालन करने के लिए उस विभाग के प्राय सभी निवासी अभ्यस्त हो गार्डनर झाल दी गई परिभाषा है कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को और देख लेते हैं दोस्तों प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तू ने राज्य का प्रयोग संपूर्ण समाज के संदर्भ में किया था और इसे अच्छे जीवन की प्राप्ति का साधन माना था तो आप जान लीजिए कि यूनानी विचारक जिन्हें प्लेटो और अरस्तू महत्वपूर्ण है वह राज्य को संपूर्ण समाज के रूप में संदर्भित करते हैं और इसे अच्छे जीवन या निषद जीवन की प्राप्ति में एक साथ मानते हैं संविदा अवधि विचारक जिसको हम समझौतावादी विचारक कहते हैं वह राज्य को यंत्र मानते हैं और राज्य को एक समझौते कपड़ा मानते हैं जो कि सभी व्यक्तियों ने आपसी समझौते से राज्य का निर्माण किया है | मार्क्सवादी विचारक आप जानते हैं कि राज्य को शोषण का यंत्र या साधन मानते हैं जिसके अधीन जो पूंजीपति वर्ग है बुर्जुआ वर्ग का शोषण करता है | इसके अलावा आदर्शवादी भी चाहिए वह शांति आदर्शवादी विचारक राज्य को सर्वोच्च नैतिक संस्था मानते हैं |
जो मनुष्य के पूर्ण नैतिक विकास के लिए आवश्यक है व्यक्तिवादी विचारक राज्य को आवश्यक बुराई मानते हैं इसमें राज्य को आवश्यक भी मानते हैं और बुराई भी मानते हैं इसका कारण क्या है आपको कमेंट बॉक्स में उत्तर बताना है तो याद रखिए व्यक्तिवादी विचारक जो है इंडिविजुअलिस्ट थिंक कर यह राज्य को आवश्यक बुराई मानते हैं, वहीं अराजकतावादी विचारक जो अनार्किस्ट हैं वह राज्य को अनावश्यक बुराई मानते हैं या नहीं अराजकतावादी विचारक राज्य को बुराई भी मानते हैं और जरूरी भी नहीं मानते हैं वह भूल वादे विचारक जो पृष्ठ कर है वह राज्य को अन्य समुदायों की भारतीय समुदाय मानते हैं यानी बहुलवादी विचारक राज्य को सर्वोच्च समुदाय नहीं मानते हैं बल्कि वह राज्य को अन्य समुदायों की तरह एक समुदाय मानते हैं देखिए महत्वपूर्ण प्रश्नों में आइए कि राज्य के सांवरिया भी सिद्धांत याग्निक सिद्धांत के समर्थक इसकी तुलना मानव शरीर से करते हैं और इसे राजनीतिक शावर मानते हैं और दोस्तों देख सकते हैं आप यूनानी विचारक जो ग्रेट थिंग कर थे वह राज्य के लिए नगर राजधानी सिटी स्टेट जिसको पॉलिश कहते हैं हमने पहले अध्याय में पढ़ा भी था कि यूनानी विचारक राज्य के लिए नगर-राज्य यानि सिटी स्टेट या पोलीस शब्द का प्रयोग करते थे और रोमन विचारक जो थे इन्होंने राज्य के लिए से विटामिंस और रिपब्लिका शब्द का प्रयोग किया है तो याद रखिएगा यह भी प्रश्न पूछा जा सकता है आप जानते हैं कि यूनानी बीच राज्य के लिए नगर-राज्य सिटी स्टेट या जिसको पोलीस कहा जाए पॉलिश शब्द का प्रयोग करते थे और रोमन विचार को ने राज्य के लिए सी विटामिन और रिपब्लिका शब्द का प्रयोग किया है |
एक महत्वपूर्ण प्रश्न देखिए एक पूछा जाता है कि आधुनिक पसंद में राजधानी स्टेट शब्द का प्रयोग सबसे पहले किसने किया था | आधुनिक संदर्भ में राज्य शब्द का प्रयोग सबसे पहले इटली के विचारक निकोलो मैकियावेली ने अपनी पुस्तक द प्रिंस में किया था और राज्य आप जानते हैं कि जो है स्टेट शब्द का हिंदी रूपांतर है अंग्रेजी के स्टेट शब्द का हिंदी रूपांतर राज्य है इसकी उत्पत्ति मूल रूप में इटैलियन भाषा के शब्द इसटैटू एसटीइटी जो राज्य शब्द की उत्पत्ति इटैलियन भाषा के शब्द इस टैटू से हुई है याद रखिएगा और मैकियावेली ने राज्य के सर्वोच्चता का समर्थन सबसे पहले किया था और इसका सारा विचार शासन कला पर है और यह कुल मिलाकर राज्य को संगठित और उसे शक्तिशाली बनाने का प्रयास करता है |
अब आइए देखते हैं राज्य की कुछ अलग तरह की परिभाषाओं को लिखिए राज्य बैक वृहद रूप है राज्य व्यक्ति का वृहद रूप है यह परिभाषा दोस्तों प्लेटो ने दी है राज्य के आगे सिद्धांत या सावयवी सिद्धांत प्लेटो और अरस्तू के समय से प्रचलित है और प्ले स्टोर कहता था कि राज्य व्यक्ति का वृहद रूप है | उसने व्यक्ति और राज्य के गुणों की विस्तृत व्याख्या की और आप जानते भी हैं कि वह कहता है कि व्यक्ति के व्यवहार में तीन गुण होते हैं | तृष्णा, मनोवेग और ज्ञान | ज्ञान और तृष्णा का स्थान मनुष्य के कमर के नीचे हैं | मनोवैज्ञानिक उसके हृदय में है और ज्ञान मस्तिष्क में है तृष्णा के इन्हीं मनुष्य के इन्हीं तीन गुणों के आधार पर दोस्तों वह राज्य के तीन वर्गों की बात करता है | देखिए तृष्णा व्यापारी में मनोविज्ञान साहब सैनिक में और ज्ञान दार्शनिकों में पाया जाता है और इन्हीं तीनों के संतुलित मेल से ज्ञान यानी विजडम का निर्माण होता है और इन तीनों के संयोग से ही राज्य का निर्माण होता तो जो व्यक्ति में गुण पाए जाते हैं वहीं राज्य में भी गुण पाए जाते हैं इसीलिए प्लेटो कहता है कि राज्य व्यक्ति का वृहद रूप है एक प्रश्न है कि राज्य व्यक्ति का पूर्वगामी हैं |
यह अरस्तु की परिभाषा है अरस्तु कहता है कि जिस तरह से पहले शरीर का निर्माण होता है उसके बाद अंगों का विकास होता है ठीक उसी प्रकार पहले राज्य आता है और उसकी शाखाएं बाद में अरस्तु कहता है कि यदि व्यक्ति का हाथ कट जाए तो शरीर के बिना निर्जीव या नष्ट हो जाता है उसी प्रकार राज्य के बिना मानव का कोई अस्तित्व नहीं है | इसी आधार पर वह अपनी परिभाषा दिखाता है कि
“राज्य व्यक्ति का पूर्वगामी है, व्यक्तियों से ही राज्य का निर्माण होता है लेकिन अगर जो दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो राज्य पूर्ण है व्यक्ति उसका अंग है देखिए एक प्रश्न पूछता है कि संकल्पना की शक्ति राज्य का आधार है तो देखिए राज्य का आधार इच्छा है, शक्ति नहीं | यह परिभाषा कि इस ग्रीन द्वारा दी गई थी मसल ग्रीन एक आदर्शवादी विचारक हैं | वह कहते हैं कि शक्ति नहीं बल्कि इच्छा यह संकल्प राज्य का आधार है अगला प्रश्न है |
“राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का अवतरण है |”
यह महत्वपूर्ण प्रश्न है बार-बार पूछा गया है कि राज्य जो है वह पृथ्वी पर ईश्वर का अवतरण है, यह परिभाषा प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हीगल द्वारा दी गई है | राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का पद छाप है राजेश्वर पर राज्य पृथ्वी पर ईश्वर की पदयात्रा है या राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का अवतरण है | तो दोस्तों ये था राज्य और उसके तत्वों के बारे में | अगर आपको Post अच्छी लगी हो तो अपने दोस्तों के साथ share करें | धन्यवाद ||
